विचार हम हासिल करते हैं, भाव हमें जन्मजात मिलते हैं। अबोध शिशु जिसके पास बोली नहीं होती, वह भी मां की प्यार भरी नजरों को पहचानता, महसूस करता और उन पर प्रतिसाद (रिस्पॉन्स) देता है। अगर उसे वहां प्यार और ममता की जगह दूसरे भाव दिखें, जैसे नाराजगी या उदासी के, तो उन्हें पहचान कर वह भी असहज हो जाता है। ये भाव उसके अंदर भी होते हैं जिन्हें वह अपने ढंग से जाहिर करता है कभी रोकर, कभी रूठकर और कभी खिलौने पटककर।
विचारों से हमारा राब्ता बाद में बनता है, जब हम पढ़ने-लिखने लगते हैं और सोचने की, विश्लेषण करने की, इस क्रम में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की, फिर उन निष्कर्षों को खारिज करके नए निष्कर्ष निकालने की क्षमता विकसित करते हैं। यह एक लंबी प्रक्रिया होती है। जाहिर है, विचार हमें हासिल करने पड़ते हैं।
तो सवाल यह है कि हमारे लिए विचार ज्यादा अहम होने चाहिए या भाव। सवाल जरूरी इसलिए भी है कि जिंदगी में इन दोनों के बीच टकराव के हालात अक्सर बन जाते हैं। किसी खास विचार या विचारधारा को स्वीकार करने वाले कई लोग जब उन विचारों से दूरी बनाते हैं तो हमेशा उसके पीछे वैचारिक कारक ही काम नहीं कर रहे होते। कई बार उसके पीछे ऐसे ‘संकीर्ण स्वार्थ’ होते हैं जिनकी जड़ में अलग-अलग तरह के भाव ही होते हैं। कभी कुछ हासिल करने की भावना तो कभी किसी से आगे निकलने की चाहत और कभी अपनों के मोह से निकली यह इच्छा कि उन्हें ज्यादा सुविधाएं मिले, उनका करियर सेट हो जाए वगैरह-वगैरह।
अपने अंदर विचार और भाव के बीच बनते इन टकरावों से हम कैसे निपटते हैं और इनमें से किसकी तरफ कितना झुकते हैं, यह अमूमन इस बात पर निर्भर करता है कि हम किसे ज्यादा अहमियत देते हैं – विचार को या भाव को। हममें से ज्यादातर लोग दोनों को साधने की कोशिश करते हैं और एक की तरफ झुकते हुए भी दूसरे को जहां तक हो सके पकड़े रहते हैं।
फिर भी, हालात ऐसे हो जाएं कि किसी एक को ही बनाए रख सकते हैं तो ज्यादातर भाव के साथ जाते हैं। वजह शायद इस तथ्य में ही है कि भाव हमारे व्यक्तित्व का ज्यादा गहरा, ज्यादा आत्मीय और ज्यादा अंतर्निहित हिस्सा है। जिंदगी में भाव के आधार पर बने रिश्ते न केवल पहले आते हैं बल्कि वे बिना शर्त बनते हैं। जैसे मां, पिता और भाई-बहनों के साथ हमारा रिश्ता, बचपन के दोस्तों के साथ बना रिश्ता।
हालांकि इसी आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लेना भी ठीक नहीं कि विचार के आधार पर बने रिश्ते कमजोर होते हैं। यह भी नहीं माना जा सकता कि भाव और विचार हमेशा परस्परविरोधी ही होते हैं। सच यह है कि ज्यादातर समय इनमें मेल होता है, कभी सचेत रूप में तो कभी अनजाने भी। अगर मेल न हो तो ये दोनों ही मनुष्यता के लिए खतरनाक साबित होते हैं। विचारहीन भावनाएं अक्सर फासिस्ट नेताओं की शरण में ले जाती हैं तो भावहीन विचार भी किसी न किसी तानाशाही को ही जन्म देते हैं।
इसके विपरीत, सही मेल हो तो ये एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं। एक विचार दूसरे विचार का दुश्मन विचारों की जमीन पर ही होता है। भावनाओं की नमी उस दुश्मनी को खत्म कर देती है और विरोधी विचारों को भी साथ में फलने-फूलने का मौका देती है। यही नहीं, वह व्यक्तित्व को इतना उर्वर बनाती है कि हमारे अपने विचार भी उसमें अच्छी तरह जड़ जमा सकते हैं।
मिसाल के तौर पर हाल में युवा प्रतिरोध का चेहरा बन कर उभरी नेहा बोरा को ले सकते हैं, जिसकी वैचारिक ऊर्जा पूरी पीढ़ी को प्रेरित कर रही है। दिलचस्प है कि उसकी परवरिश जिस पारिवारिक माहौल में हुई है, उसे वामपंथी मिजाज का तो कतई नहीं कहा जा सकता। मगर भावनाओं की नमी न तो उसके विचारों को कमजोर पड़ने दे रही है और न ही उसके परिवारिक माहौल में कोई असहजता पैदा होने दे रही।
(फोटो प्रतीकात्मक)
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं और यूट्यूब चैनल @dhoop_chhaanv चला रहे हैं।)